लेख 3: पाल, बघेल, धनगर और कुरुबा: एक ही समाज की विभिन्न उपजातियों का नृवंशविज्ञान (Anthropological) और भौगोलिक मानचित्र
प्रस्तावना: विविध नाम, एक रक्त
भारत की विशाल भौगोलिक और भाषाई विविधता के कारण, यहाँ के कई प्राचीन समुदायों को अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है। गड़रिया समाज इस विसंगति का सबसे बड़ा उदाहरण है। उत्तर भारत का 'पाल' या 'बघेल', पश्चिम का 'धनगर' और दक्षिण भारत का 'कुरुबा'—बाहरी तौर पर अलग जातियां लग सकती हैं, लेकिन नृवंशविज्ञान (Anthropology), सामाजिक ताने-बाने, कुलदेवताओं और पारंपरिक आर्थिक इतिहास के स्तर पर ये सभी एक ही महान वृक्ष की अलग-अलग शाखाएं हैं।
1. उत्तर भारत की धुरी: पाल और बघेल
उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, झारखंड, हरियाणा और दिल्ली के क्षेत्रों में इस समुदाय की घनी आबादी है। यहाँ इन्हें मुख्य रूप से दो श्रेणियों में देखा जाता है:
पाल राजवंश और उपनाम: 'पाल' शब्द संस्कृत के 'पालक' से आया है, जिसका अर्थ है रक्षा करने वाला। ऐतिहासिक रूप से, प्राचीन भारत के शासक वर्ग और चरवाहा संस्कृति दोनों में इस नाम का गहरा महत्व है। इस समाज के लोग बेहद सीधे, मेहनती और कृषि कार्य से जुड़े हैं।
बघेलखंड और बघेल उपजाति: मध्य प्रदेश के उत्तरी हिस्से और उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड से सटे इलाकों को 'बघेलखंड' कहा जाता है। इस क्षेत्र के बघेल क्षत्रियों और गड़रिया समाज के बघेल उपनाम के बीच गहरा सांस्कृतिक आदान-प्रदान रहा है। बघेल शब्द वीरता और आक्रामकता का प्रतीक है, और इस उपजाति के लोग पारंपरिक रूप से सैन्य सेवाओं और जमींदारी से जुड़े रहे हैं।
2. मध्य और पश्चिम भारत का गौरव: धनगर
महाराष्ट्र, गुजरात, गोवा और कर्नाटक के कुछ हिस्सों में इस समाज को धनगर (Dhangar) कहा जाता है।
शब्द की व्युत्पत्ति: धनगर शब्द 'धेनु' (पशुधन) या 'धन' (समृद्धि) से बना है। इस समुदाय के लोग महाराष्ट्र के इतिहास के निर्माता रहे हैं।
सामाजिक विभाजन: धनगर समाज के अंदर कई आंतरिक उप-वर्ग हैं, जैसे हाटकर (जिन्हें पारंपरिक रूप से योद्धा माना जाता है), खुटकर और झेंडे। हाटकर धनगरों का इतिहास बहुत आक्रामक रहा है; ब्रिटिश काल में इन्होंने अंग्रेजों की नीतियों के खिलाफ कई सशस्त्र विद्रोह किए थे।
3. दक्षिण भारत की रीढ़: कुरुबा और कुरुमा
कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और तमिलनाडु में इस समाज को कुरुबा (Kuruba) या कुरुमा के नाम से जाना जाता है।
ऐतिहासिक संदर्भ: कन्नड़ भाषा में 'कुरु' का अर्थ भेड़ होता है। कुरुबा समुदाय दक्षिण भारत के सबसे बड़े और राजनीतिक रूप से सबसे प्रभावशाली समुदायों में से एक है।
आध्यात्मिक संबंध: दक्षिण भारत की भक्ति परंपरा में कुरुबा समाज का स्थान अद्वितीय है। कर्नाटक के कुरुबा समाज ने भारत को संत कनकदास जैसा महान समाज सुधारक और कवि दिया, जिनकी रचनाएं आज भी कन्नड़ संस्कृति का मूल आधार हैं।
भौगोलिक और सामाजिक एकीकरण की आवश्यकता
नीचे दिए गए मानचित्र पैटर्न से हम समझ सकते हैं कि समाज पूरे भारत में किस तरह फैला हुआ है:
[उत्तर भारत: पाल / बघेल]
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[पश्चिम भारत: धनगर] ───┼─── [पूर्वी भारत: पाल / गड़रिया]
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[दक्षिण भारत: कुरुबा / कुरुमा]
वर्तमान दौर में इस भौगोलिक फैलाव का एक नुकसान यह हुआ है कि अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग नाम होने के कारण राष्ट्रीय स्तर पर इस समाज की राजनीतिक जनगणना (Political census) सही से नहीं हो पाती। यदि उत्तर भारत का पाल, महाराष्ट्र का धनगर और कर्नाटक का कुरुबा एक मंच पर आ जाएं, तो यह भारत के सबसे बड़े राजनीतिक और सामाजिक दबाव समूहों (Pressure groups) में से एक बन जाएगा।
निष्कर्ष
नाम बदलने से खून का रिश्ता नहीं बदलता। पाल, बघेल, धनगर और कुरुबा की सांस्कृतिक जड़ें, उनकी लाठी की परंपरा, उनका कंबल (कमली) और प्रकृति के प्रति उनका प्रेम बिल्कुल एक समान है। आज के डिजिटल युग में इन सभी भौगोलिक कड़ियों को एक साथ जोड़ना ही समाज की सबसे बड़ी जरूरत है।
