लेख 9: गड़रिया समाज का राजनीतिक परिदृश्य: आबादी के अनुपात में हिस्सेदारी की चुनौती और समाधान
प्रस्तावना: संख्या बल बनाम राजनीतिक शून्यता
लोकतंत्र का एक सीधा नियम है — "जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी।" लेकिन जब हम इस नियम की कसौटी पर गड़रिया (पाल, बघेल, धनगर, कुरुबा) समाज को कसते हैं, तो एक बहुत बड़ी विसंगति सामने आती है। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में इस समाज की आबादी लाखों-करोड़ों में है। कई लोकसभा और विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहाँ इस समाज का वोट बैंक हार-जीत तय करता है। इसके बावजूद, देश की मुख्यधारा की राजनीति और नीति-निर्माण (Policy-making) में इस समाज का प्रतिनिधित्व न के बराबर है।
राज्यों के अनुसार राजनीतिक स्थिति का विश्लेषण
1. उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश (पाल-बघेल बेल्ट)
यूटी और एमपी में पाल-बघेल समाज की आबादी कई जिलों (जैसे आगरा, मथुरा, इटावा, जालौन, भिंड, मुरैना, इंदौर) में निर्णायक भूमिका में है। लेकिन मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियां (BJP, SP, BSP, Congress) चुनाव के समय इस समाज का वोट तो ले लेती हैं, लेकिन जब टिकट बंटवारे या कैबिनेट मंत्री बनाने की बात आती है, तो समाज को हाशिए पर धकेल दिया जाता है। समाज का उपयोग केवल 'वोट बैंक' की तरह होता है।
2. महाराष्ट्र (धनगर समाज का प्रभाव)
महाराष्ट्र में धनगर समाज कुल आबादी का लगभग 9% से 10% है। पश्चिमी महाराष्ट्र और मराठवाड़ा की लगभग 30 से 35 विधानसभा सीटों पर धनगर समाज का सीधा प्रभाव है। यहाँ समाज ने अपनी आरक्षण की मांग (ST Status) को लेकर एक मजबूत राजनीतिक दबाव समूह बनाया है, जिसके कारण राजनीतिक दल इन्हें पूरी तरह नजरअंदाज नहीं कर पाते, लेकिन फिर भी नेतृत्व की कमान अभी भी बड़े मराठा परिवारों के हाथों में ही केंद्रित है।
3. कर्नाटक (कुरुबा समाज का राजनीतिक मॉडल)
पूरे भारत में केवल कर्नाटक ही एक ऐसा राज्य है जहाँ गड़रिया (कुरुबा) समाज ने अपनी राजनीतिक शक्ति का लोहा मनवाया है। कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया इसी कुरुबा समाज से आते हैं। उन्होंने अहिंदा (AHINDA - अल्पसंख्यक, हिंड़ड़ा और दलित) का एक ऐसा सोशल इंजीनियरिंग फॉर्मूला तैयार किया जिसने कुरुबा समाज को सत्ता के केंद्र में ला खड़ा किया। उत्तर भारत के पाल-बघेल समाज को कर्नाटक के इस मॉडल से सीखने की सख्त जरूरत है।
कर्नाटक का 'अहिंदा' (AHINDA) मॉडल
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Alminorities (अल्पसंख्यक) Backward Classes (पिछड़े/कुरुबा) Dalits (दलित समुदाय)
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[अजेय राजनीतिक गठबंधन]
राजनीतिक शून्यता के मुख्य कारण
गुटबाजी और स्थानीय नेतृत्व का अभाव: समाज के नेता राष्ट्रीय स्तर पर एकजुट होने के बजाय स्थानीय स्तर पर अलग-अलग पार्टियों के झंडे ढोने में व्यस्त रहते हैं।
आर्थिक संसाधनों की कमी: आधुनिक चुनाव बहुत खर्चीले हो गए हैं। शैक्षणिक और आर्थिक रूप से कमजोर होने के कारण समाज के योग्य युवा स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ने का साहस नहीं कर पाते।
उपनामों का भ्रम: पाल, बघेल, धनगर, होल्कर, शास्त्री जैसे अलग-अलग उपनामों के कारण पार्टियां इनकी सामूहिक जनसंख्या का सही आकलन नहीं कर पातीं।
समाधान का रोडमैप: राजनीतिक ताकत कैसे हासिल करें?
एक उपनाम, एक पहचान: राष्ट्रीय स्तर पर जनगणना और सामाजिक संवाद के लिए 'पाल-बघेल' या 'धनगर-कुरुबा' के साझा मंचों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
कर्नाटक मॉडल का अनुसरण: उत्तर भारत में भी पाल समाज को अन्य अति-पिछड़ी (Most Backward Castes) और शोषित जातियों के साथ मिलकर एक मजबूत मोर्चा बनाना होगा। अकेले चुनाव जीतना मुश्किल है, लेकिन गठबंधन (Alliance) की राजनीति में समाज किंगमेकर बन सकता है।
युवाओं को राजनीतिक प्रशिक्षण: समाज के पढ़े-लिखे युवाओं को छात्र राजनीति और स्थानीय निकायों (ग्राम पंचायत, जिला पंचायत) के चुनावों में सक्रिय रूप से आगे आना होगा। सत्ता की सीढ़ी नीचे से ही शुरू होती है।
निष्कर्ष
राजनीतिक हिस्सेदारी कोई भी दल भीख में नहीं देता; इसे अपने संख्या बल और वैचारिक मजबूती से छीना जाता है। गड़रिया समाज के युवाओं को अब 'वोटर' से 'लीडर' बनने की दिशा में कदम बढ़ाना होगा, तभी नीति-निर्माण में समाज की आवाज गूंज सकेगी।
