लेख 8: गड़रिया समाज की कुलदेवी और लोक देवता: खंडोबा, बिरोबा और गोवर्धन पूजा की सांस्कृतिक जड़ें
प्रस्तावना: प्रकृति और अध्यात्म का अद्भुत संगम
गड़रिया समाज की धार्मिक मान्यताएं और उनकी पूजा पद्धतियां भारतीय सनातन संस्कृति के उस मूल रूप को दर्शाती हैं जो सीधे प्रकृति, पशुधन और लोक-रक्षकों (Folk deities) से जुड़ा है। इस समाज के देवी-देवता कोई काल्पनिक चरित्र नहीं हैं, बल्कि वे इतिहास के ऐसे वीर नायक रहे हैं जिन्होंने पशुधन की रक्षा के लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग किया। महाराष्ट्र के खंडोबा-बिरोबा से लेकर उत्तर भारत की गोवर्धन पूजा तक, गड़रिया समाज का धार्मिक ढांचा बेहद समृद्ध और वैज्ञानिक है।
1. भगवान खंडोबा (जेजुरी के राजा)
महाराष्ट्र और कर्नाटक के धनगर-कुरुबा समाज के मुख्य आराध्य देव भगवान खंडोबा हैं, जिन्हें शिव का अवतार (मार्तंड भैरव) माना जाता है।
हल्दी का उत्सव (भंडारा): पुणे के पास जेजुरी में खंडोबा का मुख्य मंदिर है। यहाँ पूजा के दौरान भारी मात्रा में हल्दी (सोने का प्रतीक) उड़ाई जाती है, जिससे पूरा पहाड़ पीला हो जाता है। धनगर समाज के लोग खंडोबा को अपना रक्षक मानते हैं।
सैन्य संबंध: खंडोबा को घोड़े पर सवार, हाथ में तलवार लिए एक योद्धा के रूप में दिखाया जाता है, जो यह दर्शाता है कि यह समाज मूल रूप से लड़ाकू (क्षत्रिय) परंपरा का हिस्सा रहा है।
2. भगवान बिरोबा (चरवाहों के देवता)
धनगर समाज के सबसे विशिष्ट लोक देवता 'बिरोबा' (Biroba) हैं। बिरोबा को जंगलों और चरागाहों का स्वामी माना जाता है। जब चरवाहे अपनी भेड़ों को लेकर मीलों दूर अज्ञात जंगलों में जाते हैं, तो वे बिरोबा की मन्नत मांगते हैं। मान्यता है कि बिरोबा भेड़ों को भेड़ियों, बाघों और चोरों से बचाते हैं। बिरोबा के मंदिर अक्सर घने जंगलों में या पहाड़ों की चोटियों पर होते हैं, जहाँ प्रकृति की गोद में उत्सव मनाए जाते हैं।
3. उत्तर भारत में गोवर्धन पूजा और देवउठनी एकादशी का महत्व
उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार के पाल-बघेल समाज में दीपावली के अगले दिन होने वाली गोवर्धन पूजा का धार्मिक से ज्यादा आर्थिक और सामाजिक महत्व है:
| पूजा/त्यौहार | समय | गड़रिया समाज में महत्व |
| गोवर्धन पूजा | कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा | पशुधन (भेड़-बकरियों) को सजाना, गोबर के गोवर्धन बनाकर प्रकृति की पूजा करना। |
| देवउठनी एकादशी | कार्तिक शुक्ल एकादशी | इस दिन से भेड़ों के पैरों में पवित्र धागा बांधकर उनके स्वास्थ्य की कामना की जाती है। |
इस दिन पाल समाज के लोग अपनी भेड़ों के खुरों (पैरों) को रंगते हैं, उनके गले में घंटियाँ बांधते हैं और समाज के लोग एक जगह इकट्ठा होकर दूध की खीर का प्रसाद बांटते हैं। यह त्यौहार पशुओं के प्रति उनके कृतज्ञता भाव (Gratitude) को दर्शाता है।
निष्कर्ष
गड़रिया समाज की धार्मिक परंपराएं हमें सिखाती हैं कि धर्म केवल मंदिरों की चारदीवारी में नहीं, बल्कि खुले चरागाहों, मूक पशुओं की सेवा और प्रकृति के संरक्षण में बसता है। यही इस समाज की सबसे बड़ी आध्यात्मिक पूंजी है।
