धनगर समाज का अनुसूचित जनजाति (ST) आरक्षण संघर्ष: इतिहास, कानूनी अड़चनें और न्याय की मांग

GADARIYA TIMES May 21, 2026
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धनगर समाज का अनुसूचित जनजाति (ST) आरक्षण संघर्ष: इतिहास, कानूनी अड़चनें और न्याय की मांग

 


लेख 4: धनगर समाज का अनुसूचित जनजाति (ST) आरक्षण संघर्ष: इतिहास, कानूनी अड़चनें और न्याय की मांग

प्रस्तावना: एक अक्षर का ऐतिहासिक अन्याय

वर्तमान समय में महाराष्ट्र की राजनीति और सामाजिक विमर्श में यदि कोई मुद्दा सबसे ज्यादा गरमाया हुआ है, तो वह है धनगर समुदाय को अनुसूचित जनजाति (ST) का आरक्षण दिलाने का संघर्ष। यह लड़ाई पिछले कई दशकों से चल रही है। यह मामला किसी नई रियायत की मांग का नहीं है, बल्कि एक ऐसी प्रशासनिक और भाषाई गलती को सुधारने का है जिसके कारण गड़रिया/धनगर समाज के लाखों युवा अपने संवैधानिक अधिकार से वंचित हैं।

विवाद की जड़: 'Dhangad' बनाम 'Dhangar'

भारतीय संविधान के निर्माण के समय जब देश की विभिन्न जनजातियों और पिछड़ी जातियों की सूची (Schedule) बनाई जा रही थी, तब केंद्र सरकार की सूची में महाराष्ट्र की एक जनजाति का नाम दर्ज किया गया — "Dhangad" (धनगड़)

  • भाषाई विसंगति: वास्तविकता यह है कि महाराष्ट्र की भौगोलिक सीमा के अंदर 'Dhangad' (ड) नाम की कोई भी मूल जनजाति अस्तित्व में नहीं है। वहां जो समुदाय सदियों से पहाड़ों और जंगलों में रहकर भेड़-पालन करता आया है, उसे 'Dhangar' (र) कहा जाता है।

  • प्रशासनिक गलती: केवल 'र' (R) की जगह 'ड' (D) टाइप हो जाने के कारण, जब भी धनगर समाज के लोग एसटी सर्टिफिकेट के लिए आवेदन करते हैं, तो राजस्व विभाग यह कहकर खारिज कर देता है कि "आप धनगर (Dhangar) हैं, जबकि संविधान की सूची में धनगड़ (Dhangad) लिखा है।"

  संवैधानिक सूची (Typo Error): D H A N G A D (धनगड़) ──► उपलब्ध नहीं है
  वास्तविक समुदाय (Ground Reality): D H A N G A R (धनगर) ──► लाभ से वंचित

धनगर समुदाय की जनजातीय जीवनशैली (Tribal Lifestyle)

कानूनी रूप से किसी भी समुदाय को अनुसूचित जनजाति (ST) में शामिल करने के लिए पांच प्रमुख मापदंड (Locality, Tribal traits, Distinct culture, Shyness of contact, Backwardness) देखे जाते हैं। धनगर समुदाय इन सभी शर्तों को पूरा करता है:

  1. दुर्गम क्षेत्रों में निवास: धनगर समाज का एक बड़ा हिस्सा (विशेषकर चरवाहे) साल के 8 महीने पश्चिमी घाट के सह्याद्री पहाड़ों, घने जंगलों और सुदूर ग्रामीण इलाकों में तंबू लगाकर रहता है।

  2. विशिष्ट संस्कृति और कुलदेवता: इनके कुलदेवता खंडोबा और बिरोबा हैं। इनकी पूजा पद्धति, लोक नृत्य (धनगरी गजा) और प्रकृति की उपासना पूरी तरह से जनजातीय (Tribal) लोक-परंपराओं से मेल खाती है।

  3. आर्थिक पिछड़ापन: आज भी सुदूर जंगलों में भटकने वाले धनगर परिवारों के पास न तो स्थायी घर हैं और न ही उनके बच्चों के लिए आधुनिक शिक्षा के साधन।

कानूनी और राजनीतिक संघर्ष का इतिहास

इस विसंगति को दूर करने के लिए धनगर समाज ने संसद से लेकर बॉम्बे हाई कोर्ट तक लंबी लड़ाई लड़ी है। कई राज्य सरकारों ने केंद्र सरकार को सिफारिशें भी भेजीं कि 'Dhangad' और 'Dhangar' एक ही समुदाय के दो उच्चारण हैं (जैसे कुछ इलाकों में लोग भाषाई प्रभाव के कारण 'र' को 'ड' बोलते हैं)।

लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी और अन्य मौजूदा आदिवासी समुदायों के विरोध (जिन्हें डर है कि धनगरों के आने से उनका कोटा कम हो जाएगा) के कारण यह मामला फाइलों में अटका हुआ है। इसके विरोध में समाज के युवाओं ने बड़े-बड़े आंदोलन, चक्का जाम और आमरण अनशन किए हैं।

समाधान का रास्ता क्या है?

इस जटिल समस्या का समाधान केवल राजनीतिक वादों से नहीं, बल्कि ठोस कानूनी प्रक्रिया से होगा:

  • संसदीय संशोधन (Parliamentary Amendment): केंद्र सरकार को संसद में एक साधारण संशोधन विधेयक (Amendment Bill) लाकर महाराष्ट्र की एसटी सूची में "Dhangad" के साथ "Dhangar" शब्द को पर्यायवाची (Synonym) के रूप में जोड़ना होगा, जैसा कि पहले भी कई अन्य राज्यों की जातियों के साथ किया जा चुका है।

  • जातिगत जनगणना और डेटाबेस: राज्य सरकार को धनगर समुदाय के पिछड़ेपन का एक अचूक एम्पिरिकल डेटा (Empirical Data) कोर्ट के सामने पेश करना होगा, ताकि विरोधी याचिकाओं को कानूनी रूप से खारिज किया जा सके।

निष्कर्ष

धनगर समाज का एसटी आरक्षण का संघर्ष केवल सरकारी नौकरियों का मुद्दा नहीं है, यह समाज के आत्मसम्मान और संवैधानिक न्याय की लड़ाई है। जब तक एक अक्षर की इस भूल को सुधारा नहीं जाता, तब तक लोकतंत्र का यह हिस्सा खुद को हाशिए पर ही महसूस करेगा।