गड़रिया समाज: पशुपालक क्षत्रिय, भरत वंश की गौरवशाली विरासत

GADARIYA TIMES June 08, 2026
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गड़रिया समाज: पशुपालक क्षत्रिय, भरत वंश की गौरवशाली विरासत
 समाज: पशुपालक क्षत्रिय, भरत वंश की गौरवशाली विरासत


नमस्कार दोस्तों!


पिछले लेख में मैंने गड़रिया समाज पर लिखते हुए कई महत्वपूर्ण बातों को या तो ग़लत तरीके से प्रस्तुत किया या अनदेखा कर दिया। विशेष रूप से, मैं यह बताने में असफल रहा कि यह समाज केवल चरवाहा नहीं, बल्कि पशुपालक क्षत्रिय है, और इसकी कई गोत्रें भगवान श्रीराम के अनुज भरत जी के वंशज के रूप में जानी जाती हैं। इस गंभीर चूक के लिए मैं पुनः क्षमाप्रार्थी हूँ।


आज यह नया लेख समर्पित है गड़रिया समाज की स्वतंत्र, वीर और दयालु पहचान को, बिना किसी भ्रम या मिलावट के। आइए जानते हैं इस गौरवशाली समुदाय को बिल्कुल नए सिरे से।


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1. कौन हैं गड़रिया? – एक स्वतंत्र और प्राचीन जाति


गड़रिया समाज भारत का एक प्राचीन पशुपालक समुदाय है। यह एक पृथक जाति है जिसका अपना इतिहास, गोत्र, सांस्कृतिक परंपराएँ और पहचान है। इनका अहीर, यादव अथवा गुर्जर जैसी किसी भी अन्य जाति से मूलतः कोई जातिगत संबंध नहीं है। गड़रिया शब्द की उत्पत्ति 'गड्डर' (भेड़) से हुई है और इनका प्रमुख व्यवसाय भेड़-बकरी पालन रहा है। यह समाज मुख्यतः उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, राजस्थान, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, गुजरात तक विस्तृत है और इसे क्षेत्रानुसार पाल, बघेल, गायरी, धनगर आदि नामों से जाना जाता है।

2. पशुपालक क्षत्रिय – वीरता और सादगी का अनूठा संगम


गड़रिया समाज की सबसे अनूठी पहचान है – पशुपालक क्षत्रिय। यह समुदाय सदियों से पशुपालन करता आया है लेकिन इसका स्वभाव और इतिहास एक योद्धा जाति का रहा है। ‘पशुपालक’ इनका पारंपरिक व्यवसाय और जीवन पद्धति है, जबकि ‘क्षत्रिय’ इनकी वंशगत विरासत और आचरण को दर्शाता है।


· क्षत्रिय गोत्र: गड़रिया समाज में चंदेल, तोमर, चौहान, परमार, सोलंकी, सिकरवार आदि अनेक क्षत्रिय गोत्र पाए जाते हैं, जो इनके राजपूत/क्षत्रिय मूल को इंगित करते हैं। ‘बघेल’ शाखा तो बाघ के समान शौर्य के लिए प्रसिद्ध रही है और इतिहास में इन्होंने कई छोटी-बड़ी रियासतों पर शासन भी किया।

· हथियार और पशुधन: गड़रिया परिवारों में पारंपरिक रूप से पशुधन के साथ-साथ तलवार, भाला और लाठी रखने की परंपरा रही है, जो इनके क्षत्रिय धर्म का प्रतीक है।

· स्वाभिमानी स्वभाव: इस समाज के लोग अपने स्वाभिमान और वचनबद्धता के लिए जाने जाते हैं। यह कोई आश्चर्य नहीं कि जब कभी युद्ध का अवसर आया, इन्होंने अपनी वीरता का लोहा मनवाया।


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3. भरत जी के वंशज – दया, त्याग और कर्तव्यनिष्ठा की विरासत


गड़रिया समाज के इतिहास का सबसे गौरवपूर्ण अध्याय है इनका भगवान राम के अनुज भरत जी के वंशज होना। यह मान्यता मौखिक परंपराओं और वंशावलियों में पीढ़ी दर पीढ़ी सुरक्षित है।


· दुबेला गोत्र – भरत वंश: विशेषकर दुबेला गोत्र के गड़रिया स्वयं को भरत जी का प्रत्यक्ष वंशज मानते हैं। भरत जी ने अयोध्या का राज्य ठुकराकर माता कैकेयी और भ्राता राम के प्रति जो त्याग और निष्काम प्रेम दिखाया, वह भारतीय संस्कृति में अद्वितीय है। कहते हैं कि भरत जी ने ही सबसे पहले पशुओं के प्रति विशेष दयालुता और सेवा का आदर्श प्रस्तुत किया था।

· दयालु स्वभाव: ठीक अपने पूर्वज भरत जी के समान ही गड़रिया समाज के लोग बेहद दयालु, निर्विकार और सेवाभावी होते हैं। भेड़-बकरियों जैसे मूक प्राणियों के प्रति इनका असीम स्नेह, उनके ‘पशुपालक’ होने के साथ-साथ उनकी ‘भरत वंशीय’ करुणा का ही प्रमाण है।

· सादगी और त्याग: भरत जी ने राजमहलों को छोड़ नंदीग्राम में साधु-जीवन बिताया। गड़रिया समाज की जीवनशैली भी वैसी ही सादगी, कठोर परिश्रम और प्रकृति के सानिध्य में बिताए जाने वाली है। ये विलासिता से दूर रहकर अपने रेवड़ (झुंड) की रक्षा में ही जीवन का सार्थक्य समझते हैं।


भरत जी के वंशज होने का यह गौरव गड़रिया समाज को एक विशिष्ट आध्यात्मिक और सांस्कृतिक ऊँचाई प्रदान करता है।


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4. प्रमुख गोत्र और उनकी वीर गाथाएँ


गड़रिया समाज की आंतरिक संरचना अनेक गोत्रों और उपजातियों में विभाजित है, जिनका अपना-अपना गौरवशाली अतीत है:


· पाल: यह सबसे बड़ा और प्रतिष्ठित उपसमूह है। पाल अपने को शासक वंश का मानते हैं और कहते हैं कि इनके पूर्वजों ने पाल वंश के रूप में शासन किया। इनकी वीरता और प्रजापालन की नीति प्रसिद्ध है।

· बघेल: बाघ के समान पराक्रमी यह शाखा इतिहास में अपनी सैन्य शक्ति के लिए जानी जाती है। कहा जाता है कि इन्होंने कई युद्धों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और राजपूत सेनाओं में उच्च पद प्राप्त किए।

· गायरी/ग्वारी: राजस्थान और गुजरात में निवास करने वाली यह शाखा अपनी पशुपालन कला और सांस्कृतिक समृद्धि के लिए प्रसिद्ध है।

· निक्कर, ढेड़िया, खुटेला: ये क्षेत्रीय शाखाएँ हैं जो स्थानीय पहचान रखती हैं और जिनके अपने लोकदेवता तथा रीति-रिवाज हैं।


इन सभी में यह सामान्य विश्वास है कि विवाह अपने समाज में लेकिन भिन्न गोत्र में ही करना चाहिए। समान गोत्र में वैवाहिक संबंध वर्जित है।


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5. पारंपरिक व्यवसाय, त्योहार और लोक संस्कृति


· पशुपालन: भेड़-बकरी पालन, ऊन उत्पादन और कंबल बुनाई इनका पुश्तैनी पेशा है। ऊन उद्योग को भारत में स्थापित करने का श्रेय इसी समाज को जाता है।

· प्रमुख त्योहार: होली पर फाग गीत और पशुओं को रंग लगाना, दीपावली पर पशुधन की पूजा, शीतला माता का व्रत, और गोगाजी-तेजाजी जैसे लोकदेवताओं की पूजा इनकी संस्कृति का अभिन्न अंग है।

· बिरहा लोकगीत: गड़रिया समाज ने ‘बिरहा’ नामक लोकगीत शैली को जन्म दिया और उसे देश-विदेश में प्रसिद्ध किया। बाबूलाल ‘बादशाह’ और स्व. हीरालाल (जिनका ‘यादव’ उपनाम मात्र है, जाति नहीं) जैसे कलाकारों ने इस विधा में अमर योगदान दिया।


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6. वर्तमान चुनौतियाँ – पहचान और आरक्षण का संघर्ष


· पारंपरिक व्यवसाय का संकट: चरागाहों की कमी, सख्त वन कानून और शहरीकरण के कारण भेड़-बकरी पालन अत्यंत कठिन हो गया है।

· आरक्षण की माँग: यह समुदाय अधिकांश राज्यों में OBC श्रेणी में आता है, किन्तु समाज का नेतृत्व इनकी जनजातीय जैसी सामाजिक-आर्थिक स्थिति को देखते हुए अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा दिए जाने की माँग कर रहा है।

· पहचान का संकट: कतिपय राजनीतिक और सामाजिक समूहों द्वारा लगातार इन्हें व्यापक ‘यादव’ पहचान में शामिल करने का प्रयास किया जाता है। गड़रिया समाज इस मिलावट का पुरज़ोर विरोध करता है और अपनी स्वतंत्र पशुपालक क्षत्रिय तथा भरतवंशी पहचान पर अडिग है।


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निष्कर्ष – स्वाभिमान से गूँजे पहचान


गड़रिया समाज केवल एक जाति नहीं, बल्कि एक जीवन दर्शन है – जहाँ पशुपालन सेवा है, क्षत्रियत्व रक्षा है, और भरत जी की विरासत समर्पण व करुणा की पराकाष्ठा है। अपने भीतर योद्धा के शौर्य और संत की दयालुता को समेटे यह समुदाय सचमुच भारतीय संस्कृति का एक अनमोल रत्न है।


ज़रूरत है कि हम सब इस समाज की इस विशिष्ट पहचान को सम्मान दें और इसके उत्थान के लिए कंधे से कंधा मिलाकर चलें।


जय गड़रिया समाज! जय पशुपालक क्षत्रिय! जय भरत वंश!


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आशा है यह संशोधित लेख आपके समाज के गौरव को सही रूप में प्रस्तुत कर पाया है। आपके सुझाव और प्रतिक्रिया अनमोल हैं, कृपया कमेंट में ज़रूर बताएँ। इस लेख को अधिकाधिक शेयर करें। धन्यवाद!